संतमत सरकार एक पूर्णतया आध्यात्मिक संस्था है, जिसका उद्देश्य ज्ञान-योग-युक्त ईश्वर-भक्ति का प्रचार-प्रसार कर मानव मात्र को मोक्ष के पथ पर अग्रसर करना है। यह संस्था संतमत के शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित है, जो जीवात्मा को परम सर्वेश्वर से एकत्व का अनुभव कराने का मार्ग प्रशस्त करती है।
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संतमत सरकार (एक आध्यात्मिक साम्राज्य)ज्ञान-योग- युक्त ईश्वर-भक्ति का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से स्थापित पूर्णतया आध्यात्मिक संस्था है। इस संस्था के अव्यक्त-संरक्षक के रूप में 20वीं सदी के महान् संत परमाराध्य महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज हैं तथा उनके ही द्वारा विरचित सदग्रंथ "सत्संग-योग (चारों भाग)" उनके व्यक्त-प्रतिनिधि के रूप में इस संस्था के लिए व्यक्त-संरक्षक हैं। यह "सत्संग-योग (चारों भाग)"- सदग्रंथ संतमत का गुरुग्रंथ के नाम से भी सुप्रसिद्ध है। "संतमत सरकार (एक आध्यात्मिक साम्राज्य)" निम्नलिखित संतमत-सिद्धांत पर आधारित, ज्ञान-योग-युक्त ईश्वर-भक्ति के प्रचार-प्रसार का कार्य सर्वसाधारण के उपकारार्थ सदैव करता रहेगा। संतमत-सिद्धांत १-जो परम-तत्व आदि-अंत-रहित, असीम, अजन्मा, अगोचर, सर्वव्यापक और सर्वव्यापकता के भी परे है, उसे ही सर्वेश्वर-सर्वधार मनना चाहिए तथा अपरा (जड़) और परा (चेतन) दोनों प्रकृतियों के पार में, आगुण और सगुण पर अनादि-अनंत-स्वरूपी, अपरंपार शक्ति-युक्त, देशकालातीत, शब्दातीत,नाम-रूपातीत, अद्वितीय, मान-बुद्धि और इंद्रियों के परे जिस परम सत्ता पर यह सारा प्रकृति-मंडल एक महान् यंत्र की नाईं परिचालित होता रहता है, जो न व्यक्ति और न व्यक्त है ,जो मायिक विस्तृतत्व-विहीन है, जो अपने से बाहर कुछ भी अवकाश नहीं रखता है, जो परम सनातन, परम पुरातन एवं सर्वप्रथम से विद्यमान है, संतमत में उसे ही परम अध्यात्मपद वा परम अध्यात्मस्वरूपी परम प्रभु सर्वेश्वर (कुल्ल मलिक) मानते हैं। २-जीवात्मा सर्वेश्वर का अभिन्न अंश है ३-प्रकृति आदि-अंत-सहित है और सृजित है । ४-मायाबद्ध जीव आवागमन के चक्र में पड़ा रहता है ।इस प्रकार रहना जीव के सब दुःखों का कारण है ।इससे छुटकारा पाने के लिए सर्वेश्वर की भक्ति ही एकमात्र उपाय है । ५-मानव-जप, मानस-ध्यान, दृष्टि-साधन और सूरत-शब्द-योग द्वारा सर्वेश्वर की भक्ति करके अंधकार,प्रकाश और शब्द के प्राकृतिक तीनों परदौं से पार जाना और सर्वेश्वर से एकता का ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष पा लेने का मनुष्य मात्र अधिकारी है । ६-झूठ बोलना, नशा खाना ,व्यभिचार करना, हिंसा करनी अर्थात् जीवों को दुःख देना मत्स्य-मांस को खाद्य पदार्थ समझना और चोरी करनी ;इन पांचों महापापों से मनुष्यों को अलग रहना चाहिए । ७- एक सर्वेश्वर पर ही अचल विश्वास, पूर्ण भरोसा तथा अपने अंतर में ही उनकी प्राप्ति का दृढ़ निश्चय रखना, सद्गुरु की निष्कपट सेवा, सत्संग और दृढ़ ध्यानाभ्यास ;इन पांचो को मोक्ष का करण समझना चाहिए।
संतमत सरकार एक पूर्णतः आध्यात्मिक संस्था है, जो सभी संतों के एकमत सिद्धांत “संतमत” पर आधारित है। यह संस्था आध्यात्मिक-शिक्षा को उसी प्रकार समाज में स्थापित करने का कार्य कर रही है, जैसे आज भौतिक-शिक्षा का प्रचलन है।
शान्ति का अर्थ — स्थिरता और निश्चलता।
जो शान्ति को प्राप्त कर ले — वही सन्त।
सन्तों के मत या धर्म को — सन्तमत कहते हैं।
शान्ति की खोज मानव हृदय की स्वाभाविक प्रेरणा है।
उपनिषदों, कबीर साहब, गुरु नानक साहब आदि संतों की वाणी — संतमत की मूल भूमि है।
संतमत का आध्यात्मिक आधार शांति, स्थिरता और आत्मानुभूति पर टिका हुआ है। यह वह सार्वभौमिक मार्ग है, जो मानव-हृदय की स्वाभाविक शांति-प्राप्ति की प्रेरणा से उद्भूत होकर प्राचीन उपनिषदों, ऋषि-मुनियों तथा संत-परंपरा के अनुभूत सत्य को समन्वित रूप में प्रस्तुत करता है।!
संतमत सरकार किसी एक संप्रदाय या मत तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राचीन ऋषियों से लेकर आधुनिक संतों तक के एकमत सिद्धांत “संतमत” पर आधारित है, जो सभी संत परंपराओं को एक सूत्र में पिरोता है।
यहाँ प्रस्तुत ज्ञान केवल शास्त्रीय नहीं, बल्कि श्रद्धा-सिद्ध, तर्क-सिद्ध तथा अनुभव-सिद्ध है— जिसमें द्वैत और अद्वैत दोनों का परीक्षित एवं संतुलित विवेचन किया जाता है।
संतमत सरकार का आध्यात्मिक शिक्षण परमाराध्या महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज द्वारा विरचित अनमोल गुरुग्रंथ “सत्संग योग (चारों भाग)” पर आधारित है, जो सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान का समन्वित और सारगर्भित मार्गदर्शन देता है।
यह संस्था आध्यात्मिक शिक्षा को संगठित, व्यवस्थित और सार्वभौमिक रूप में प्रस्तुत करने हेतु संतमत-सत्संग-दरबार रूपी विश्वविद्यालय के माध्यम से कार्य करती है।
संतमत सरकार का उद्देश्य किसी मत, धर्म या ग्रंथ का खंडन नहीं, बल्कि सभी धार्मिक सद्ग्रंथों, संतों और परंपराओं की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना है।
यद्यपि नाम में “सरकार” शब्द है, फिर भी यह संस्था राजतांत्रिक नहीं, पूर्णतः प्रजातांत्रिक और आध्यात्मिक है— जहाँ सभी संत, साधक, विद्वान और जिज्ञासु विनम्र आमंत्रण और विचार-विमर्श द्वारा सहभागी बनते हैं।
संतमत सरकार का मूल लक्ष्य है— मानव को शांति, स्थिरता, आत्मबोध और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करना, ताकि आध्यात्मिक शिक्षा भी भौतिक शिक्षा के समान समाज में प्रतिष्ठित हो सके।
संतमत मानव जीवन के मूल उद्देश्य—आंतरिक शांति और आत्मबोध—की ओर ले जाने वाला एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक पथ है। यह मार्ग बाह्य आडंबर से परे, अनुभूति, तर्क और श्रद्धा के संतुलन पर आधारित है।!
संतमत के अनुसार शांति कोई विचार मात्र नहीं, बल्कि अंतःकरण की स्थिर अवस्था है, जिसे साधना और सत्संग के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।.
संतमत में द्वैत और अद्वैत का परीक्षित, तर्कसंगत एवं अनुभूत विवेचन किया जाता है, जिससे साधक भ्रम से मुक्त होकर सत्य की ओर अग्रसर होता है।
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संतमत सरकार के अंतर्गत कार्यरत हमारे मार्गदर्शक वे साधक, संत एवं विद्वान हैं, जिन्होंने अनुभव, सत्संग और साधना के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान को आत्मसात किया है। ये मार्गदर्शक संतमत के सिद्धांतों के अनुरूप शांति, आत्मबोध और सत्य की ओर साधकों का मार्गदर्शन करते हैं, ताकि प्रत्येक जिज्ञासु अपने अंतःकरण में स्थिरता और स्पष्टता प्राप्त कर सके।t!
संतमत सरकार
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संतमत सरकार
"गुरु परंपरा के सत्संग और मार्गदर्शन से मेरे जीवन में गहरी शांति और स्थिरता आई है। अब मैं परिस्थितियों में उलझता नहीं, बल्कि उन्हें समझकर स्वीकार कर पाता हूँ।"
बिहार
"संतमत के सत्संग और गुरु के निर्देशों ने मुझे बाहरी आडंबर से हटाकर आत्मचिंतन की ओर प्रेरित किया। जीवन का उद्देश्य अब स्पष्ट है।"
उत्तर प्रदेश
"द्वैत और अद्वैत को लेकर जो भ्रम था, गुरु परंपरा के मार्गदर्शन से वह दूर हुआ। अध्यात्म अब केवल विचार नहीं, बल्कि अनुभव बन गया है।"
झारखंड
यहाँ संतमत की परंपरा के अनुरूप आध्यात्मिक लेख, चिंतन और अनुभूत विचार प्रस्तुत किए जाते हैं, जो साधक को शांति, स्थिरता और आत्मबोध की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इन लेखों के माध्यम से उपनिषदों, संत-वाणी और सत्संग योग के सिद्धांतों को सरल एवं व्यवहारिक रूप में समझने का प्रयास किया गया है।
01 Jan 2025
3 Commentsशांति केवल बाहरी परिस्थितियों का अभाव नहीं, बल्कि मन की स्थिर अवस्था है। संतमत बताता है कि सत्संग, साधना और आत्मचिंतन से शांति स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।
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01 Jan 2025
3 Commentsआत्मबोध ही आध्यात्मिक जीवन का मूल उद्देश्य है। संतमत साधक को अपने भीतर झाँकने और स्वयं को जानने की प्रेरणा देता है।
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01 Jan 2025
3 Commentsसंतमत न तो केवल द्वैत तक सीमित है, न ही केवल अद्वैत तक। यह दोनों का परीक्षित और अनुभूत समन्वय प्रस्तुत करता है, जिससे साधक भ्रम से मुक्त होता है।
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